रेल गाडी स्टेशन पर पहुच चुकी थी, मैं रेलगाडी से उतर कर कुली की राह देखने लगा। सामान के रूप में मेरे साथ 3 अटैची थी इसलिए कुली के बिना बाहर तक आना मुश्किल था। मुझे देख के 3—4 कुली मेरे करीब आ गये और सामान स्वयं ले चलने का आग्रह करने लगें। मोल—भाव शुरू हो गया पर काफी बात करने पर भी किराया तय नहीं हो सका। मुझे जायज से ज्यादा लग रहा था उन मेहनती लोगाें का किराया सोचा ‘‘मेहनत करते है देने से अच्छा है की मै खुद ही सामान ले कर बाहर जा सकता हूं आखिर मै भी तो स्वाभिमानी हूं खुद का काम खुद कर सकता हूं‘‘ और अपना सामान खुद ले कर चल दिया।

रेल गाडी स्टेषन पर पहुच चुकी थी, मैं रेलगाडी से उतर कर कुली की राह देखने लगा। सामान के रूप में मेरे साथ 3 अटैची थी इसलिए कुली के बिना बाहर तक आना मुष्किल था। मुझे देख के 3-4 कुली मेरे करीब आ गये और सामान स्वयं ले चलने का आग्रह करने लगें। मोल-भाव षुरू हो गया पर काफी बात करने पर भी किराया तय नहीं हो सका। मुझे जायज से ज्यादा लग रहा था उन मेहनती लोगां का किराया सोचा ‘‘मेहनत करते है तो क्या ज्यादा किराया लेगें उन्हें ज्यादा किराया देने से अच्छा है की मै खुद ही सामान ले कर बाहर जा सकता हूं आखिर मै भी तो स्वाभिमानी हूं खुद का काम खुद कर सकता हूं‘‘ और अपना सामान खुद ले कर चल दिया।


जैसे तैसे बाहर आ गया सामान के साथ, पसीने से भीगा हुआ और रिक्षे वाले की खोज में लग गया। एक रिक्षा वाला दिखा जिसके एक पैर नहीं था, वह एक पैर से रिक्षा चलाता था। दिल में दयाभाव भी आ गया और बिना किसी मोलभाव के एक दाम में ही तय कर लिया। इस बार मेरा स्वाभिमान उसकी मदद करने के लिये कह रहा था। रिक्षा चल दिया मेरे घर के रास्ते पर ।


मेहनत से वह रिक्षे वाला एक पैर से ही दुसरे साधारण रिक्षे वालों जैसे ही रिक्षा चला रहा था। न जाने क्यों उसे देख कर उस के लिये मेरे मन में एक सम्मान की भावना जाग गयी थी।
रिक्षा धीरे से एक भीड वाली जगह पहुच गया था। षायद रिक्षे वाले को थोडा मुष्किलों का सामना करना पड रहा था पर वह कुछ बोला नहीं। थोडी देर तक मैने देखा फिर मुझसे रहा नहीं गया और मैने कहा ‘‘मै थोडी देर के लिये रिक्षे से उतर जाता हूं फिर आप आराम से इसे चला लोगे इस भीड में‘‘ उसने नहीं में अपना सर हिलाया और कहा ‘‘नहीं बाबु आप बैठे रहिये हमारे लिये रोज का काम है हम रिक्षा चला लेगें‘‘ और मुझे उतरने नहीं दिया न ही रिक्षा रोका। अब मुझे बिल्कुल भी सही नहीं लग रहा था मैने उसे फिर से वही कहा पर वह नहीं माना। कई बार कहने पर भी उसका जवाब वही रहा और मेरा घर आ गया। उसने अपना किराया लिया और चला गया मै उसे जाते हुये देख रहा था इस ख्याल से की बहुत स्वाभिमानी था। मुझे मेरा स्वाभिमान, उसके स्वाभिमान के आगे झुठा और दिखावा भी लग रहा था। उसके स्वाभिमान में सन्तुप्टि और खुषी महसुस हो रही थी और एक सच्चाई का अहसास था। षायद यही स्वाभिमान की अनुभूति सच्ची और सही थी जो दिल से महसुस हो रही थी न की दिमाग से।

द्वारा
अनुज गुप्ता

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