जब परम व्योम में काल सुप्त;ऊर्जा जर्जर एवं जड़वत.
थी दिशा न कोई कहीं और तम गहन अमूर्त निश्चल शंकित.
रचना हेतु उन्मुख हुई थी नारी ही रच नारायण.
ध्वज धर सृष्टि का,नारी ही करती आई है पारायण.
वह निराकार साकार स्वरूप में प्रकृति है कही गई.
प्रकृति अर्थात प्रवृत्ति और वह इसमें प्रवृत यहीं हुई. 
अगणित हैं देह धरे उसने संचालित करने सृष्टि यह.
हर शून्य भरा नारी ही ने व सृष्टि किया है अमृतमय. 
सौन्दर्य,शौर्य का संमिश्रण,नारी है नर का नारायण.
वह सर्वरूप,वह सर्वशक्ति वह शस्त्र,शास्त्र करती धारण.
वह अखिल ब्रह्म की आदिशक्ति सृष्टि का सूत्र रच हुई प्रकट.
फ़िर बीज बीज का तंत्रजाल योजित,निर्मित किया अंडक्रोड़.
उस अंडक्रोड़ में अंतर्वर्ती वह बीज सृष्टि का प्रथम खंड.
उसका विकास लालन-पालन,शिक्षा-दीक्षा करना प्रचंड.
यह विश्व,विश्व का क्रिया-कलाप जिससे संचालित, है नारी.
जिसकी शक्ति से शक्तिमान यह जगत वही है यह नारी.
उस महान नारी-स्वरूप का आज करे सब पद वन्दन.
जीव-जगत,निर्जीव-जगत में है नारी तत्व का स्पंदन.
किन्तु,कभी नारी मन ने नर का है किया अपमान नहीं.
कहती आई वह नहीं स्वतंत्र, नर ही है उसका प्राण सही.
हे नर तुम मेरे पति,गति,पालक,संहारक,परमानन्द.
तेरा स्वरूप मेरा परमेश्वर, तुम रचते मेरा सर्वानन्द.
कहते हैं जब नारी प्रकट हुई कंचन-कान्ति सी प्रभामयी.
मुस्कान मंद,थे नयन प्रफुल्ल,वह कोटि सूर्य सी कान्तिमयी.
रत्नाभ आभरण,श्री अंग,रक्ताभ वेश,अरुणाभ पट्ट,दुर्गा स्वरूप. 
सर्जन को प्रस्तुत हुई नारी, सर्वांग ही उनका शक्तिरूप. 
यह नारी अजस्रा तन कोमल हो जाये जब-जब है कठोर.
अस्तित्व सृजन का तब होगा भूलुंठित व विध्वंस घोर.
इतनी महान नारी सारी उपलब्धि पुरुष को दे आई. 
इसलिए नार नारायणी है स्तुति करें दें अचवाई.(आचमन)

अरुण कुमार प्रसाद

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