चाहे जीते कोई या हारे कोई
पर बिगड़ी हालात को सुधारे कोई

जो दुर्दशा है आज इस उजड़े चमन का 
गुलिस्ताँ वतन का संवारे कोई 

कब तक लड़ोगे जाति-मज़हब के नाम पर
हम इंसानो को कभी इंसान पुकारे कोई

नहीं माँगता “इंदर” तुमसे मुकम्मल जहाँ
क़तरा-क़तरा सही वतन को निखारे कोई

चाहे जीते कोई या हारे कोई
पर बिगड़ी हालत को सुधारे कोई

इंदर भोले नाथ

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