अनाथ

ANATH SAHITYA JUNCTION

पत्नी की रोजरोज की चिकचिक से परेशान हो कर महेश पिताजी को अनाथालय में छोड़ दरवाजे से बाहर तो
आ गया, मगर मन नहीं माना. कहीं पिताजी का मन यहाँ लगेगा कि नहीं. यह जानने के लिए वह वापस
अनाथालय में गया तो देखा कि पिताजी प्रबंधक से घुलमिल कर बातें कर रहे थे. जैसे वे बरसों से एकदूसरे को
जानते हैं.
पिताजी के कमरे में जाते ही महेश ने पूछा, “ आप इन्हें जानते हैं ?” तो प्रबंधक ने कहा, “ जी मैं उन्हें
अच्छी तरह जानता हूँ. वे पिछले ३५ साल से अनाथालय को दान दे रहे हैं . दूसरा बात यह है कि ३५ साल पहले
जिस बालक को वे इसी अनाथालय से गोद ले गए थे, वहीँ उन्हें यहाँ छोड़ गया.”
यह सुनते ही महेश के पैरों तले की जमीन खिसक गई, ‘ वह अनाथ है .’

ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दोष किसका…..

dosh kiska

लक्ष्मी को 10 वर्ष पूर्व मरे बच्चे की याद आ गई, ” मेरा बच्चा कहां है ?”
” वह तो उसी समय मर गय था ?”
” आप झूठ बोल रहे हैं. मुझे वह नर्स मिली थी, जिस ने मेरा प्रसव करवाया था. उस ने सच्चाई बात दी है. मेरा बच्चा जीवित पैदा हुआ था.”
” क्या ! ” पति बोला, ” उस ने पूरी सच्चाई नहीं बताई ?”
” मैं कुछ नहीं जानती. मुझे मेरा बच्चा चाहिए. आप मां की ममता क्या जाने ? आप पिता है. मैं ने उसे नौ माह पेट में रखा. मैं जानती हूं कि इतने साल उस के बिना कैसे रही ? आप यह बात समझ नहीं पाएंगे. क्यो कि आप एक मर्द है.” यह कहते हुए लक्ष्मी रो पड़ी.
” अरे भाग्यवान ! वह मरा हुआ पैदा हुआ था. तू समझती क्यों नहीं हैं ?”
” आप झुठ बोल रहे हैं. ” कहते हुए लक्ष्मी ने अपने पति का हाथ पकड़ कर अपने सिर पर रख दिया, ” मेरी कसम खा कर कहिए. मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था.”
पति चुप रहा.
” आप बोलते क्यों नहीं ? मेरा बच्चा कहां गया ?” लक्ष्मी ने पति को झिझोड़ कर कहा, ” बताइए. आप को मेरी कसम है.”
” तू ने कसम खिला कर अच्छा नहीं किया लक्ष्मी. तू नहीं जानती लक्ष्मी कि वह हमारे लिए कलंक था. उसे जहां जाना था, वहां चला गया. उसे याद कर के अपनी कोख को क्यों लजाती हो.”
सुन कर लक्ष्मी पति को मुंह देखने लगी, ” वह नपुसंक पैदा हुआ था इसलिए उसे अपने वाले लोग आ कर ले गए.” कह कर पति ने अपने आंसू पौंछ कर अपना मुंह फेर लिया और चुपचाप घर से बाहर निकल गया.

ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

अनाथालय


बारिश का मौसम था। दादाजी सुबह सुबह छाता लेकर घूमने निकल गए थे। वापस लौटते वक़्त बारिश तेज़ हो गई थी, दादाजी ने अपनी गति बढ़ा दी, अचानक उनकी नज़र सड़क पर पड़ी एक चिड़िया पर पड़ी। वह घायल थी पानी में पूरी भीग चुकी थी, उड़ना तो क्या अब तो चल भी नहीं पा रही थी। दादाजी कोमल ह्रदय वाले थे, उनसे किसी को तकलीफ में देखा नहीं जाता था। वह झट से उसे अपनी गोद में उठकर घर ले आए। घर ला कर उसकी मल्लम- पट्टी की और उसे दाना डाला। दोपहर में जब उनका जवान पोता कॉलेज से लोटा तो चिड़िया को कमरे में देख बोला “ये क्या है दादाजी? आप आज इसे घर ले आए? पिछले हफ्ते उस कुत्ते के पिल्लै को ले आए थे! वह पिल्ला आज भी बाहर ही घूमता रहता है। दादाजी इस घर को अनाथालय बनाना है क्या?” दादाजी के दिमाग की रील उलटी घूम गई। उन्हें याद आ गई वो सारी बाते जब आनके बेटे की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद एक दिन सड़क पर पड़े एक लावारिस बच्चे को वह घर ले आए थे। उसे पाला पोसा था एकदम अपने बच्चे की तरह फिर उसकी शादी भी शान से की। लेकिन आज उसी की औलाद मुझसे सवाल करने लगी है। वह चुप रहे, कुछ नहीं बोले लेकिन उनका मन कहे रहा था, बेटा ये घर तो शुरू से ही अनाथालय है अगर बरसों पहले उस अनाथ बच्चे को घर न लता तो आज मुझसे यह सवाल पूछने वाला भी कोई न होता।

 


परिपूर्ण त्रिवेदी

स्वाभिमान की अनुभूति

रेल गाडी स्टेशन पर पहुच चुकी थी, मैं रेलगाडी से उतर कर कुली की राह देखने लगा। सामान के रूप में मेरे साथ 3 अटैची थी इसलिए कुली के बिना बाहर तक आना मुश्किल था। मुझे देख के 3—4 कुली मेरे करीब आ गये और सामान स्वयं ले चलने का आग्रह करने लगें। मोल—भाव शुरू हो गया पर काफी बात करने पर भी किराया तय नहीं हो सका। मुझे जायज से ज्यादा लग रहा था उन मेहनती लोगाें का किराया सोचा ‘‘मेहनत करते है देने से अच्छा है की मै खुद ही सामान ले कर बाहर जा सकता हूं आखिर मै भी तो स्वाभिमानी हूं खुद का काम खुद कर सकता हूं‘‘ और अपना सामान खुद ले कर चल दिया।

रेल गाडी स्टेषन पर पहुच चुकी थी, मैं रेलगाडी से उतर कर कुली की राह देखने लगा। सामान के रूप में मेरे साथ 3 अटैची थी इसलिए कुली के बिना बाहर तक आना मुष्किल था। मुझे देख के 3-4 कुली मेरे करीब आ गये और सामान स्वयं ले चलने का आग्रह करने लगें। मोल-भाव षुरू हो गया पर काफी बात करने पर भी किराया तय नहीं हो सका। मुझे जायज से ज्यादा लग रहा था उन मेहनती लोगां का किराया सोचा ‘‘मेहनत करते है तो क्या ज्यादा किराया लेगें उन्हें ज्यादा किराया देने से अच्छा है की मै खुद ही सामान ले कर बाहर जा सकता हूं आखिर मै भी तो स्वाभिमानी हूं खुद का काम खुद कर सकता हूं‘‘ और अपना सामान खुद ले कर चल दिया।


जैसे तैसे बाहर आ गया सामान के साथ, पसीने से भीगा हुआ और रिक्षे वाले की खोज में लग गया। एक रिक्षा वाला दिखा जिसके एक पैर नहीं था, वह एक पैर से रिक्षा चलाता था। दिल में दयाभाव भी आ गया और बिना किसी मोलभाव के एक दाम में ही तय कर लिया। इस बार मेरा स्वाभिमान उसकी मदद करने के लिये कह रहा था। रिक्षा चल दिया मेरे घर के रास्ते पर ।


मेहनत से वह रिक्षे वाला एक पैर से ही दुसरे साधारण रिक्षे वालों जैसे ही रिक्षा चला रहा था। न जाने क्यों उसे देख कर उस के लिये मेरे मन में एक सम्मान की भावना जाग गयी थी।
रिक्षा धीरे से एक भीड वाली जगह पहुच गया था। षायद रिक्षे वाले को थोडा मुष्किलों का सामना करना पड रहा था पर वह कुछ बोला नहीं। थोडी देर तक मैने देखा फिर मुझसे रहा नहीं गया और मैने कहा ‘‘मै थोडी देर के लिये रिक्षे से उतर जाता हूं फिर आप आराम से इसे चला लोगे इस भीड में‘‘ उसने नहीं में अपना सर हिलाया और कहा ‘‘नहीं बाबु आप बैठे रहिये हमारे लिये रोज का काम है हम रिक्षा चला लेगें‘‘ और मुझे उतरने नहीं दिया न ही रिक्षा रोका। अब मुझे बिल्कुल भी सही नहीं लग रहा था मैने उसे फिर से वही कहा पर वह नहीं माना। कई बार कहने पर भी उसका जवाब वही रहा और मेरा घर आ गया। उसने अपना किराया लिया और चला गया मै उसे जाते हुये देख रहा था इस ख्याल से की बहुत स्वाभिमानी था। मुझे मेरा स्वाभिमान, उसके स्वाभिमान के आगे झुठा और दिखावा भी लग रहा था। उसके स्वाभिमान में सन्तुप्टि और खुषी महसुस हो रही थी और एक सच्चाई का अहसास था। षायद यही स्वाभिमान की अनुभूति सच्ची और सही थी जो दिल से महसुस हो रही थी न की दिमाग से।

द्वारा
अनुज गुप्ता