“हरिया”

एक बूढ़ी दादी दरवाजे से बाहर आई, और रोते हुए मंगरू से बोली, बेटा तुम्हे लड़का हुआ है ! पर बेटा तोहार मेहरारू बसमतिया इस दुनिया से चल बसी, अब इस अभागे का जो है सो तुम्ही हो ! बेचारी इतने सालों से एक औलाद के लिए तरसती रही, इतने सालों बाद भगवान ने उसकी इच्छा पूरी की, तो बेचारी उसकी सकल देखे बिना ही इस दुनिया से चल बसी ! बेचारी बड़ी अभागन थी ये कहकर बूढ़ी दादी रोने लगी ! ये सब सुनके मंगरू को तो जैसे साँप सूंघ गया, बेचारा पागलों की तरह दहाड़े मार के रोने लगा ! और चिल्ला चिल्ला कर ये कह रहा था, हे भगवान तूने ये क्या किया एक दुआ के बदले तूने मेरी पूरी दुनिया छिन्न ली ! अगर मुझे पता होता के तूँ मेरी एक दुआ के बदले,मेरी पूरी दुनिया मुझसे छिन्न लेगा तो मैं कभी भी तुझसे औलाद न माँगता ! इतने सालों से जिस औलाद के लिए मैं तरस रहा, तूने इतने सालों बाद उसे दिया भी तो उसके बदले मुझसे मेरी पूरी दुनिया छिन्न ली ! अब तूँ ही बता मैं क्या करूँ ? मेरी बसमतिया मुझे छोड़कर चली गई ये कह कर चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा !
बीना दूसरी शादी किए ही मंगरू बच्चे को पालने लगा, दिन बीतते गये, मंगरू ने बड़ी मेहनत की उस साल खेतो मे अच्छे- ख़ासे फसल हुए, कुछ अनाज अपने लिए रख कर उसने सारे अनाज बेच दिए, उस पैसे से उसने दो जोड़ी बैल खरीद लिए, अपने खेत की बुआई-जुताई करने बाद, दूसरों के खेत भी जोते और बोये, मिले पैसों मे से आधा तो वो बैलों पे खर्च कर देता, ताकि उनकी सेहत बनी रहे, तभी तो वो ज़्यादा से ज़्यादा खेत जुटाई कर पाएँगे, और आधा पैसा बचा के रखता,खाने की कमी तो थी नही, घर मे अनाज भरा पड़ा था,दिन बीतते गये दूसरे साल भी अच्छी फसल हुई, अपने लिए कुछ अनाज रख कर उसने सारे अनाज बेंच दिए, मन्गरु बड़ा खुश था, काफ़ी पैसे उसने जमा कर लिए थे ! सोचता काश ये अच्छे दिन देखने के लिए मेरी बासमतिया जिंदा होती, फिर मन ही मन कहता चलो जो हुआ सो हुआ,जो नही है उसके याद मे रोने से क्या फ़ायदा,मंगरू के दिल मे अपने बेटे “हरिया” के लिए काफ़ी अरमान थे, गाव वालों से कहता मैं तो अनपद-गवार रह गया, लेकिन अपने बेटे “हरिया” को मैं एक काबिल इंसान बनाउँगा पढ़ा लिखा कर ! खूब पढ़ाउँगा मैं उसे, जो ग़रीबी के दिन मैने देख हैं वो नही देखेगा,लेकिन मंगरू के अरमान तब टूट गये जब “हरिया” 6 साल का हुआ, क्योंकि वो और बचों की तरह नही था, वो नाही किसी बच्चे के साथ खेलता ना किसी से बात करता, बस चुपचाप गुमसूम सा रहता, ना खुद ख़ाता ना नाहाता सारा कुछ मंगरू को ही करना पड़ता, बस यही दुख मंगरू को खाए जा रही था ! के मेरे बाद इसका क्या होगा, मैं कब तक जिंदा रहूँगा और इसकी देख भाल करता रहूँगा ! कितने अरमान सजाए थे, मैने इसके लिए ! कभी खुद को कोसता तो कभी भगवान को बुरा भला कहता,हे भगवान ये तूने क्या किया, इतने सालों बाद तूने एक औलाद दी,उसके बदले मेरी पत्नी मुझसे छिन्न ली, इसके बाद भी मैंने दिल पे पत्थर रख लिया, ये सोचकर के तूने औलाद तो दी, लेकिन किस काम की ऐसी औलाद, इससे अच्छा था के तू मुझे निवंश ही रखता, अरे मैं कब तक जीता रहूँगा इसकी देख भाल के लिए, मेरे मरने के बाद क्या होगा इसका कौन इसकी देख भाल करेगा, बस यही चिंता मंगरू को खाए जा रही थी, नाही खेती मे उसका मन लगता, ना किसी काम मे!
दिन बीतते गये, मंगरू जब उन्ह बच्चों को देखता जो हरिया से उम्र मे छोटे थे, और विद्यालय मे पढ़ने जाया करते थे ! ये देख हरिया और टूट जाता और मन ही मन कहता काश मेरा हरिया भी इनकी तरह होता, तो कितना अच्छा होता, हे भगवान तूने मेरे ही साथ ऐसा क्यों किया ! और फिर खुद को कोसता और भगवान को बुरा भला कहता !हरिया अब 14 साल का हो गया था ! लेकिन सिर्फ़ उम्र से, बाकी दिमाग़ से वो ५-६ साल का बच्चा ही था, एक दिन अचानक मंगरू की तबीयत खराब हुई, और वो भी हरिया को इस दुनिया मे अकेला छोड़ चल बसा,हरिया को इतनी समझ तो थी नहीं वो क्या करता, पड़ोसियों ने जैसे-तैसे इंतेजाम कर लाश को श्मशान ले जाकर जलाया ! मरने के बाद जो बिधि होती है वो चलता रहा, ९वें दिन एक पड़ोसी हरिया को लेकर पंडित जी के पास गया, और बोला पंडित जी कल दसवाँ है (जिस दिन पिंड दान होता है) उ दान का समान लिख देते का-का दान होता है !फिर क्या था, पंडित जी ने लंबा से सामग्रियों का चिट्ठा पकड़ा दिया उन्हे ! और कहा के ईमा जवन-जवन लिखा है उ सब लाना तभी मन्गरुवा के आत्मा को शांति मिलेगा नहीं तो उसकी आत्मा भटकती रहेगी !पैसे तो थे नहीं अब इसलिए पड़ोसी हरिया को लेकर लाला के पास गया, और जो थोड़ा बहुत खेत था लाला के पास गिरवी रख के पैसे लाया ! दान का सारा समान खरीद लाए जो भी अक्कड़म-बक्कड़म पंडित जी ने लिखा था !पंडित जी ने आते ही पूछा, हाँ भाई सारा समान लाए हो न दान वाला जवन-जवन मैने लिखा था ! हाँ पंडित जी हम उ सब समान लाया हूँ, जवन-जवन आप लिखे रहें, पड़ोसी ने कहा ! पंडित जी बैठ गये पूजा पर, बैठते ही अरे उ दूब (एक प्रकार की घास,जिसे कुश भी कहते हैं पिंड दान के लिए अति-उत्तम आवश्यकता होती है उसकी) नही लाए क्या ! तभी पड़ोसी ने हरिया से कहा के, जा खेत से दूब लेके आ ! और हाँ देखना साफ-सुथरा हो गंदा-वन्दा न हो…..हरिया चला गया खेत मे दूब लाने, उसने एक गठर डूब काट लिए, खेत से दूब लेकर आ रहा था ! तभी उसे रास्ते मे एक गढ़े मे मरी हुई गाय दिखी जो किसी ने फेंक रखी थी, अब हरिया ठहेरा मन्द-बुद्धी, सोचा गाय बड़ी कमजोर हो गई है, शायद इसने कुछ खाया नही होगा ! घास का गठर उसके सामने रख वहीं बैठ गया !उधर पंडित जी गुस्से से आग बबुला हो रहे थें, गलियाँ दिए जा रहे थें ! न जाने कहाँ जाके मर गया ससुरा, अबे तूँ क्या खड़ा-खड़ा मेरा मुँह देख रहा है, जाके देख कहाँ मार गया वो ! गरजते हुए पंडित जी ने पड़ोसी को बोला…….पड़ोसी भागता हुआ खेतों की तरफ निकल पड़ा, देखा के हरिया एक गढ़े मे मरी हुई गाय के पास, घास का गठर रख के बैठा हुआ है !तूँ यहाँ क्या कर रहा है रे हरिया बैठ के, उधर पंडित जी कब से बैठे हैं, चल जल्दी दूब लेके ! दूब और हरिया को लेकर पड़ोसी पंडित जी के पास आया, पंडित जी हरिया को देखते ही, इतना देर से का कर रहा था रे हरामखोर कहाँ मर रहा था अब तक ! उ पंडित जी गैया को घास खिला रहा था, हरिया ने कहा ! क्या….. हम इहा पूजा पे बैठा तुम्हरा इंतजार कर रहा हूँ और तुम उँहा गाय को घास खिला रहे हो…… तभी पड़ोसी ने कहा” उ भी मरी हुई गाय को पंडित जी…..अब तो पंडित जी का पारा और गरम हो गया ! क्या……….. अरे हरामखोर मरी हुई गाय कभी घास खाती है रे…….जो तूँ उका खिला रहा था !पंडित जी के मुँह से निकला ये शब्द न जाने कैसे हरिया के दिमाग़ की बत्ती जला दी……..तभी हरिया ने चिल्ला कर के पंडित जी से कहा, जब मरल (मरी हुई) गैया घास नाही खाए सकत, फिर हमर मरल बाबू ई सब दान का समान कईसे ले जायेगा !जैसे ही पंडित जी ने हरिया के मुँह से ये शब्द सुना, उनके पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी ! फिर क्या था, पंडित जी ने गाव वालों से कहा अरे ई मूर्ख का बकवास किए जा रहा है, और तुम लोग खड़े-खड़े सुन रहे हो ! अरे ई पागल को मार के भागाओ इसे यहाँ से वरना अनर्थ हो जाएगा…..अरे ई तो पागल है तुम लोग तो सही हो मार के भागाओ इसे गाँव से !फिर क्या था गाँव वालों ने पंडित जी की बात सुनी नहीं के हरिया को गाँव से मार-मार के बाहर निकल दिया ! ये कह के, तूँ पागल हो गया है……अगर तूँ गाँव मे रहा तो गाँव का सत्यानाश हो जाएगा…………………!!
आज भी न जाने कितने हरिया गाँव से निकाल दिए जाते हैं, या फिर उनकी आवाज़ दफ़न कर दी जाती है ! जब भी खोखले रिवाज़ों के प्रति आवाज़ उठाते हैं………………………
मरे हुए की आत्म्शान्ति के लिए सर्वोत्तम दान बस पिंड दान ही है………..और बाकी के दान तो अपनी इच्छानुसार है…….!!

 इंदर भोले नाथ…


भूख की आग

बहुत पहले की बात है किसी राज्य मे एक राजा रहता था। राजा बहुत ही बहादुर, पराकर्मी होने के साथ-साथ घमंडी और दुष्ट प्रवृति का भी था। उसने बहुत से राजाओं को हराकर उनके राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। उसके बहादुरी और दुष्टता के क़िस्से दूर-दूर तक फैले हुए थे। वो किसी भी साधु-महात्मा का कभी सत्कार नहीं करता था,बल्कि उनसे ईर्ष्या करता था।

एक बार उसने किसी राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा को बंदी बनाकर उसके राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। जीत की ख़ुशी में उसने एक बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया, जिसमें उसने अन्य राज्य के राजाओं, राजकुमारों, बड़े-बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों को आमंत्रित किया। उसने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि जश्न मे सिर्फ़ उन्हें ही आने दिया जाए जो किसी राज्य के राजा, राजकुमार, उद्योगपति या व्यापारी हों, अन्यथा और किसी को न आने दिया जाए। वरना उसके साथ-साथ कर्मचारियों को भी सज़ा दी जाएगी।

उसी दिन एक महात्मा जो किसी दूर राज्य से चलकर उस राज्य मे प्रवेश किए थे। दो-तीन दिनों से कुछ खाया नहीं था, भूख और प्यास से उनका बुरा हाल था। तभी दूर वो जश्न नज़र आया उन्हें, लंबे-लंबे क़दम भरते हुए वो भी उसमे शामिल होने पहुँचे। मगर राजा के कर्मचारियों ने उन्हें, अंदर जाने से मना कर दिया बोले हमारे राजा का हुक्म है कि सिर्फ़ राजा, राजकुमार, उद्योगपत्तियों और व्यापारियों को ही अंदर जाने दिया जाए। अन्यथा वो उसके साथ-साथ हमें भी सज़ा देंगे। महात्मा ने बड़े अनुनय-विनय किए कर्मचारियों से, मगर वो भी क्या करें उन्हें भी तो हिदायत दी गई थी। महात्मा वापस लौट आए, मगर पेट की आग उन्हें मजबूर कर रही थी, भूख की आग अब सही नहीं जा रही थी । और दूर से पकवान की खुश्बू उन्हें और मजबूर कर रही थी, वहाँ जाने को। दूसरे रास्ते से कर्मचारियों से छुपते-छुपाते वो किसी तरह वहाँ पहुँच गये जहाँ पकवान खिलाया जा रहा था। तभी किसी कर्मचारी ने उन्हें देख लिया और पकड़ के राजा के पास ले गया।

राजा ने उस महात्मा को बड़े ही घृणा भरी दृष्टि से देखते हुए, कहा तुम कैसे महात्मा हो जो थोड़ी सी भूख बर्दाश्त नहीं कर पाए और चोरी से हमारे जश्न में शामिल हो गये। तुम महात्मा नहीं चोर हो, और भी खरी-खोटी सुनाते हुए राजा ने महात्मा को बिना खाना खिलाए ही अपने सैनिकों को आदेश दिया कि महात्मा को १०० कोड़े लगाकर राज्य से बाहर कर दिया जाए।

बहुत दिनों बाद एक दिन राजा अपने सैनिकों के साथ जंगल मे शिकार खेलने गया। घना जंगल दूर-दूर तक फैला हुआ था।

शिकार की तलाश मे राजा काफ़ी दूर निकल आया। सैनिक भी कहीं पीछे छूट गये थे, घना जंगल था राजा रास्ता भूल गया और जंगल मे भटक गया। काफ़ी कोशिश की राजा ने रास्ता ढूँढने की और अपने सैनिकों से मिलने की मगर नाकामयाब रहा!

जंगल मे इधर-उधर भटकते हुए राजा काफ़ी थक गया, भूख और प्यास भी लग गई थी। राजा खाना और पानी की तलाश में भटकता रहा, मगर ना ही उसे खाने के लिए फल मिले और ना ही जंगल में कोई झरना दिख रहा था जिससे वो अपनी प्यास बुझा सके। बुरा हाल था राजा का एक तो सफ़र करते-करते थक गया था, ऊपर से भूख और प्यास ने राजा को ब्याकुल कर दिया। जंगल में भटकते-भटकते रात होने लगी, तभी कहीं दूर राजा को हल्की सी रोशनी दिखाई दी। लंबे-लंबे क़दम भरते हुए राजा रोशनी के पास पहुँचा। एक छोटी सी झोंपड़ी के अंदर दीपक जल रहा था। राजा ने झोंपड़ी के पास जा के देखा, एक महात्मा ध्यान मग्न थे। राजा झोंपड़ी के समीप ही मुँह के बल ज़मीन पे गिर गया। एक तो थकावट और ऊपर से भूख-प्यास ने राजा को निर्बल बना दिया था। राजा के गिरने की आहट सुन कर महात्मा का ध्यान टूटा। बाहर आकर देखा झोंपड़ी के समीप कोई इंसान अधमरा सा मुँह के बल ज़मीन पर गिरा पड़ा है। महात्मा अंदर से जल लेकर आए और राजा के मुँह पे छींटे मारे। राजा होश में आया और उनके हाथ से जल का पात्र छीन सारा जल एक ही घूँट मे पी गया।

महात्मा ने उससे पूछा, “कौन हो आप और इतनी रात गये इस जंगल मे क्या कर रहे हो?”

राजा महात्मा के चरणों मे गिरते हुए बोला, “हे महात्मा! पहले आप मुझे कुछ खाना खिलाएँ, मैं भूख से मरा जा रहा हूँ। उसके बाद मैं आपको सारा वृतांत बताऊँगा।”

महात्मा ने कहा, “पहनावा और कमर की तलवार बता रही है कि आप कहीं के राजा हो, अभी मेरे पास कुछ विशिष्ट तो नहीं है आपको खिलाने के लिए,” एक पात्र जिसमें कुछ फल रखे हुए थे,उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, “कुछ फल पड़े हुए हैं जिसे बंदरों ने जूठा कर दिया है, अगर आप चाहे तो….”

अभी महात्मा ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी, राजा उठा और फल का पात्र उठा के सारे फल खा गया और पानी पी के वहीं ज़मीन पर लेट गया। महात्मा ने कहा, “हे राजन! अगर आप चाहो तो झोंपड़ी में विश्राम कर सकते हो।”

राजा ने कहा, “नहीं महात्मा आज मुझे सच्ची भूख, उन फलों से तृप्ति और गहरी नींद का एहसास इस ज़मीन पे हो रहा है।” और राजा वहीं ज़मीन पर सो गया।

सुबह महात्मा ने राजा को उठाते हुए कहा, “हे राजन! उठो सुबह हो गई, चलो झरने के शीतल जल मे स्नान कर के कुछ ताज़े फल खालो।”

राजा ने जैसे ही आँखें खोलीं, सामने महात्मा का चेहरा देख के हताश सा हो गया और उनके चरण पकड़ के क्षमा माँगने लगा।

“हे महात्मा! क्षमा कर दीजिए हमें, हमने आपके साथ बड़ा ही दुष्ट व्यवहार किया था, हमसे बहुत बड़ा पाप हो गया था उस दिन। हमें क्षमा करें, हे महात्मा। हमने आपको बिना भोजन कराए, और १०० कोडे की सज़ा देकर अपने राज्य से निकाला था, मैं बहुत बड़ा पापी हूँ, हे महात्मा मुझे क्षमा करें। भूख और प्यास की आग क्या होती है, ये मुझे कल पता चला, मुझे क्षमा करें हे महात्मा!” राजा घंटों तक महात्मा के चरणों से लिपटा क्षमा माँगता रहा।

महात्मा ने कहा, “हे राजन! मेरे मन मे तुम्हारे लिए कोई द्वेष या क्रोध नहीं है। मैंने तो तुम्हें उसी दिन क्षमा कर दिया था।”

महात्मा ने राजा को झरने के शीतल जल में स्नान करा कर कुछ ताज़े फल दिए खाने को। राजा फल खा रहा था, तब तक राजा के सैनिक भी राजा को ढूँढते हुए वहाँ पहुँच गये। राजा ने सैकड़ों बार महात्मा को अपने राज्य चलने को कहा, पर महात्मा ने मना करते हुए कहा, “हे राजन आज तो नहीं मगर फिर कभी ज़रूर आऊँगा आपका आतिथ्य स्वीकार करने।”

राजा ने महात्मा से विदा लेते हुए अपने किए हुए दुष्ट ब्यव्हार का फिर से क्षमा माँगी और अपने सैनिकों के साथ अपने राज्य वापस लौट आया।

फिर उसके राज्य के लोगों ने जिस राजा को देखा ये राजा वो राजा नहीं था, जिसमें घमंड और दुष्टता भरी हुई थी, जो साधु-महात्मा का सत्कार नहीं करता था और उनसे ईर्ष्या करता था। बल्कि उस राजा को देखा जो विनम्र था और अपने प्रजा के साथ अच्छा व्यव्हार करता था और साधु-महात्माओं का सत्कार और उनकी इज़्ज़त करता था।

इंदर भोले नाथ