वो …

पूजा की सामग्रियां , दिये में घृत – तेल ।
तुमसे ही आराधना, तुम ही प्रभु से मेल ।।

तुमसे ही गुण- धर्म हों , तुमसे ही व्यापार ।
तुमसे संचित पुण्य हों , अपनापन औ प्यार ।।

तुम पूजा की थाल सी , पुष्प, धुँआ और धूप ।
तेरी बनकर आरती, मैं देखु उसका रूप ।।


परिपूर्ण त्रिवेदी

अनाथालय


बारिश का मौसम था। दादाजी सुबह सुबह छाता लेकर घूमने निकल गए थे। वापस लौटते वक़्त बारिश तेज़ हो गई थी, दादाजी ने अपनी गति बढ़ा दी, अचानक उनकी नज़र सड़क पर पड़ी एक चिड़िया पर पड़ी। वह घायल थी पानी में पूरी भीग चुकी थी, उड़ना तो क्या अब तो चल भी नहीं पा रही थी। दादाजी कोमल ह्रदय वाले थे, उनसे किसी को तकलीफ में देखा नहीं जाता था। वह झट से उसे अपनी गोद में उठकर घर ले आए। घर ला कर उसकी मल्लम- पट्टी की और उसे दाना डाला। दोपहर में जब उनका जवान पोता कॉलेज से लोटा तो चिड़िया को कमरे में देख बोला “ये क्या है दादाजी? आप आज इसे घर ले आए? पिछले हफ्ते उस कुत्ते के पिल्लै को ले आए थे! वह पिल्ला आज भी बाहर ही घूमता रहता है। दादाजी इस घर को अनाथालय बनाना है क्या?” दादाजी के दिमाग की रील उलटी घूम गई। उन्हें याद आ गई वो सारी बाते जब आनके बेटे की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद एक दिन सड़क पर पड़े एक लावारिस बच्चे को वह घर ले आए थे। उसे पाला पोसा था एकदम अपने बच्चे की तरह फिर उसकी शादी भी शान से की। लेकिन आज उसी की औलाद मुझसे सवाल करने लगी है। वह चुप रहे, कुछ नहीं बोले लेकिन उनका मन कहे रहा था, बेटा ये घर तो शुरू से ही अनाथालय है अगर बरसों पहले उस अनाथ बच्चे को घर न लता तो आज मुझसे यह सवाल पूछने वाला भी कोई न होता।

 


परिपूर्ण त्रिवेदी